बिहार में डराने वाली सच्चाई: दो महिलाओं की मौत, दो जिलों की कहानियां और एक ही सिस्टम पर उठते सवाल
पटना/वैशाली।
बिहार में हाल के दिनों में सामने आई दो अलग-अलग घटनाएं अब केवल “मौत” की खबर नहीं रहीं, बल्कि वे राज्य की जांच व्यवस्था, पुलिस की कार्यशैली और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल बन चुकी हैं। एक ओर राजधानी पटना में NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा की रहस्यमयी मौत, तो दूसरी ओर वैशाली जिले में BPSC से चयनित एक महिला शिक्षिका की आत्महत्या दोनों घटनाएं यह सोचने को मजबूर करती हैं कि आखिर बिहार में महिलाओं के साथ क्या हो रहा है?
पटना: NEET छात्रा की मौत जल्दबाज़ी में ‘आत्महत्या’ का ठप्पा?
पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में NEET की तैयारी कर रही छात्रा की मौत की खबर सामने आते ही पुलिस ने इसे आत्महत्या करार दे दिया। शुरुआती बयान में कहा गया कि छात्रा ने नींद की गोलियों का ओवरडोज़ ले लिया था।
पुलिस के इस बयान ने मामले को लगभग खत्म मान लिया था। न कोई बड़ा सवाल, न किसी तरह की गहराई से जांच की बात।
लेकिन असली झटका तब लगा जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बदली पूरी कहानी
रिपोर्ट के अनुसार:
- छात्रा के कंधे, गर्दन और छाती पर नाखूनों के स्पष्ट निशान थे
- उसके कपड़ों पर स्पर्म के अंश पाए गए
- प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान मौजूद थे
ये सभी तथ्य किसी भी आम नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि —
क्या कोई आत्महत्या करने वाला व्यक्ति इस तरह के संघर्ष के निशान छोड़ सकता है?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने यह साफ संकेत दिया कि छात्रा के साथ संघर्ष हुआ, और उसकी मौत सामान्य आत्महत्या नहीं हो सकती।
पुलिस की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
- पोस्टमार्टम से पहले ही पुलिस ने आत्महत्या का निष्कर्ष कैसे निकाल लिया?
- क्या शुरुआती जांच में लापरवाही हुई, या जानबूझकर सच को हल्का दिखाया गया?
- अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आती, तो क्या यह मामला हमेशा के लिए “सुसाइड” बनकर दफन हो जाता?
यह मामला अब सिर्फ एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि जांच व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन गया है।
वैशाली: BPSC शिक्षिका की मौत और एक सुसाइड नोट जो बहुत कुछ कहता है
दूसरी घटना वैशाली जिले की है, जहां BPSC से चयनित एक महिला शिक्षक की मौत हुई। इस मामले में महिला ने एक सुसाइड नोट छोड़ा, जिसने सबको अंदर तक झकझोर दिया।
यह सुसाइड नोट किसी सामान्य आत्महत्या नोट जैसा नहीं है, बल्कि इसमें कई ऐसी बातें लिखी हैं जो अनकहे दर्द और दबाव की ओर इशारा करती हैं।
सुसाइड नोट की अहम बातें
महिला ने लिखा:
- “मेरी मुखाग्नि मेरे पति से नहीं, मेरी बेटी से दिलवाई जाए”
→ यह पंक्ति बताती है कि महिला अपने अंतिम संस्कार तक के फैसले में भी खुद की इच्छा दर्ज कराना चाहती थी। - “मेरे मोबाइल के नोट्स में कुछ वीडियो और ऑडियो हैं”
- “उनका पासवर्ड मेरे पति के पास है”
इन बातों से यह साफ झलकता है कि महिला के पास कुछ ऐसे तथ्य या सबूत थे, जिन्हें वह मरने से पहले संकेत के रूप में छोड़ना चाहती थी।

यह सिर्फ आत्महत्या नहीं, एक संकेत है
सुसाइड नोट की भाषा भावुक है, लेकिन साथ ही बेहद सोच-समझकर लिखी गई लगती है।
यह सवाल उठता है:
- क्या महिला किसी मानसिक या सामाजिक दबाव से गुजर रही थी?
- क्या उसके पास मौजूद वीडियो और ऑडियो की जांच गंभीरता से की जा रही है?
- क्या उसकी आवाज़ उसकी मौत के बाद भी सुनी जाएगी?
दो घटनाएं, दो ज़िले लेकिन कहानी एक.
पटना की छात्रा और वैशाली की शिक्षिका दोनों पढ़ी-लिखी, अपने भविष्य को लेकर संघर्ष कर रही महिलाएं थीं। लेकिन दोनों की मौतों के बाद जो सवाल उठे, वे लगभग एक जैसे हैं।
- जल्दबाज़ी में आत्महत्या घोषित करना
- गंभीर पहलुओं को नजरअंदाज करना
- महिलाओं की बातों को आखिरी पल तक हल्के में लेना
बिहार में यह क्या हो रहा है?
इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है —
क्या बिहार में महिलाओं की मौतों को “सुसाइड” कहकर खत्म कर देना सबसे आसान रास्ता बन गया है?
जब तक इन मामलों की:
- निष्पक्ष जांच
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर ठोस कार्रवाई
- और सुसाइड नोट में लिखी बातों की गंभीर पड़ताल
नहीं होती, तब तक न्याय सिर्फ कागज़ों में रहेगा।
यह खबर नहीं, चेतावनी है
यह रिपोर्ट किसी को दोषी ठहराने का दावा नहीं करती, लेकिन यह ज़रूर कहती है कि चुप रहना अब विकल्प नहीं है।
आज सवाल नहीं पूछे गए, तो कल कोई और बेटी, कोई और महिला इसी तरह खबर बन जाएगी।
बिहार को जवाब देना होगा —
आख़िर यह सब कब तक?












